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Monday, June 22, 2020
डायरी
Tuesday, April 21, 2020
मास्टर साहेब (master saheb) कविता
Monday, September 30, 2019
भिक्षु (कविता)
आज भिक्षु को सोते देखा मैंने
मेरे सामने रखा कटोरा भी पुकार रहा था
शायद वह भिक्षु सपने मे भी गुहार रहा था
आज भूखा ही सोया हूँ मैं
कभी कभी तो पुरा दिन रोया हूँ मैं।
आज भिक्षु के मन को देखा है मैंने
कोई इच्छा से सन्त बन जाता है
तो कोई समय के द्वारा भिक्षु बनाया जाता है
कुछ मक्कारो के कारण आज जरूरत मन्द को मरना पडता है
आज सच्चे भिखारी होने का भी विश्वास दिलाना पडता है।
आज भिक्षु के पिड़ा को देखा है मैंने
जहाँ बच्चों को दान का पाठ सिखाया जाता है
वही देखते ही उनसे दूर हटाया जाता है
कुछ कामचोरो का भी यही व्यापार है
जिससे दुर्व्यवहार का भिक्षु आज शिकार है ।
आज सन्त औऱ भिक्षु के अन्तर को जाना है मैंने
सन्त हो या भिक्षु ,जो प्रभु का नाम पुकार रहे है
वे सभी अपनी वृद्धावस्था गुजार रहे है
अगर मोह त्यागने की होती सन्त क्षमता
तो कोई भिक्षु वेश मे कभी न रमता ।
आज भिक्षु के भाव को महसूस किया है मैंने
सन्त को इच्छा की चाह नहीं
औऱ भिक्षु को घर ,परिवार के सपनों की राह नहीं
केवल यही भूल है उसकी,नहीं तो वह सन्त होता
घृणात्मक शब्द भिक्षु के रूप मे कभी न उसका अन्त होता ।।
गुंजन द्विवेदी
Thursday, May 16, 2019
विद्यार्थी
मै आने वाले कल का सार्थी हूँ।
मैं एक विद्यार्थी हूँ।
मुझ मे कोई अंश नहीं है भय का।
लेकिन मैं लालिमा जरूर हूँ सूर्योदय का।।
इस जग को पार करने मे।
हमने तैराकी सीखा है।
कितनो को तो हमने।
नौका से पार होते देखा है ।।
अपने परिवार के खुशी का लोर हूँ मैं।
दुनिया संग अपने घर का भोर हूँ मै।
इस अँधेरे रात मे प्रकाश का आभाव हूँ मै।
लेकिन दीपक के ज्योति सा प्रभाव हूँ मैं ।।
विद्यार्थी का सीखना सर्वप्रथम धर्म है।
केवल ज्ञान अर्जित करना ही हमारा कर्म है।
सबकुछ धन नहीं ,यह हमारा भ्रम है।
फिर भी हमारे देश मे अवसर के क्या क्रम है ।।
अब बेरोजगारी नहीं,
रोजगार मे घटाव दिखाई दे रहा है ।
हमारी सरकार से केवल ,
बचाव सुनाई दे रहा है ।
यह कहने के लिए ,मैं क्षमाप्रार्थी हूँ ।
क्योंकि मैं एक विद्यार्थी हूँ ।
मै आने वाले कल का सार्थी हूँ।
मैं एक विद्यार्थी हूँ।
मुझ मे कोई अंश नहीं है भय का।
लेकिन मैं लालिमा जरूर हूँ सूर्योदय का।।
गुंजन द्विवेदी
Monday, May 13, 2019
अब गाँव भी कहता, मै भी जल्दी शहर बन जाऊँगा।।।
यह शोर शराबा मेरा पिछा नहीं छोडता
अब मन करता है, मै ही शहर छोडता
कहाँ-कहाँ मैं भग के रहने जाऊँगा
अब गाँव भी कहता, मै भी जल्दी शहर बन जाऊँगा।।
बच्चों की छुट्टियों मे भी नजर नहीं आऊँगा
अब लोगों के फार्म हाऊस पर ही दिख पाऊँगा
शुध्द दूध, दही, घी क्या खाओगे
यहाँ तक की शुध्द आक्सीजन भी नहीं पाओगे।।
लेकिन मेरा मित है कहता, मुझे भी शहर आना है
कुछ दिन बुढी माँ का ,बोझ नहीं उठाना है
और मुझे भी बच्चों को , शहर मे पढाना है
बस यही सोचता आज हमारा जबाना है ।।
यह शोर शराबा मेरा पिछा नहीं छोडता
अब मन करता है, मै ही शहर छोडता
कहाँ-कहाँ मैं भग के रहने जाऊँगा
अब गाँव भी कहता, मै भी जल्दी शहर बन जाऊँगा।।
गाँव के छोटे किसानों को मत मिटाओ
क्योंकि कोई बडा, किसान नहीं दिखता
बिना अनाज के हमें से कोई
इंसान नहीं टिकता ।।
मैं कहु तो ,मेरे गांव को शहर मत बनाओ
बस कुछ सुविधा वहाँ उपलब्ध कराओ
ऐसा न हो तो ,मेरे शहर को ही गांव बना दो
भले ही एक नया GST ग्राम सर्विस टैक्स लगा दो ।।
यह शोर शराबा मेरा पिछा नहीं छोडता
अब मन करता है, मै ही शहर छोडता
कहाँ-कहाँ मैं भग के रहने जाऊँगा
अब गाँव भी कहता, मै भी जल्दी शहर बन जाऊँगा।।
गुंजन द्विवेदी ।
यह शोर शराबा मेरा पिछा नहीं छोडता ।।
यह शोर शराबा मेरा पिछा नहीं छोडता
अब मन करता है, मै ही शहर छोडता
कहाँ-कहाँ मैं भग के रहने जाऊँगा
अब गाँव भी कहता, मै भी जल्दी शहर बन जाऊँगा।।
बच्चों की छुट्टियों मे भी नजर नहीं आऊँगा
अब लोगों के फार्म हाऊस पर ही दिख पाऊँगा
शुध्द दूध, दही, घी क्या खाओगे
यहाँ तक की शुध्द आक्सीजन भी नहीं पाओगे।।
लेकिन मेरा मित है कहता, मुझे भी शहर आना है
कुछ दिन बुढी माँ का ,बोझ नहीं उठाना है
और मुझे भी बच्चों को , शहर मे पढाना है
बस यही सोचता आज हमारा जबाना है ।।
गाँव के छोटे किसानों को मत मिटाओ
क्योंकि कोई बडा, किसान नहीं दिखता
बिना अनाज के हमें से कोई
इंसान नहीं टिकता ।।
मैं कहु तो ,मेरे गांव को शहर मत बनाओ
बस कुछ सुविधा वहाँ उपलब्ध कराओ
ऐसा न हो तो ,मेरे शहर को ही गांव बना दो
भले ही एक नया GST ग्राम सर्विस टैक्स लगा दो ।।
गुंजन द्विवेदी ।
Wednesday, May 8, 2019
तुमको देख रोम भी हर्ष मनाता ।।
तुमको देख रोम भी हर्ष मनाता
इस भाव को ओठ भी रोक न पाता
जाने तुम कैसी बला हो
ईश्वर की अनोखी कला हो
तुम्हारे नज़दीक आकर
अज़ीब खुशी का आलम रहता है
बातें तो बहुत है
पर मन ही कहता रहता है
अपनी सुन्दरता का हमें भी राज दे
वरना मेरी ज़िन्दगी आकर साज़ दे
तुम मे हमने अपने को देखा है
क्या हम भी तेरे हाथ की रेखा है
हर एक पल मे तेरी आस है
मेरे अपनो के बाद
तु दुसरी जीने की सासँ है
न जाने कैसा यह एहसास है
तुमको देख रोम भी हर्ष मनाता
इस भाव को ओठ भी रोक न पाता
जाने तुम कैसी बला हो
ईश्वर की अनोखी कला हो ।।
गुंजन द्विवेदी
Friday, February 22, 2019
तु बिन लिखी कैसी किताब(कविता)
बिन लफ्जो की कैसी जुबान है
शायद तु मेरे आसुँओ का हिसाब है
नहीं तो मेरे जख्मो का निशान है ।।
लोग अपनाएँगे मेरी राह
कुछ पढेगे मेरी कहानी
साकार होगी मेरी रात सुहानी।।
कुछ को पडेगी आखँ चुरानी
मेरी हार की यही हार होगी
फिर तरक्की की ही बहार होगी ।।
अपने पर इतना विश्वास हो
बिन दाग तो चाँद न हो
चाहे वो कोई भी मास हो ।।
सवार दे मेरे आने वाले कल को
करना न पडे मुझे दुनियाँ सा छल
मुझे मिले बस मेरे कर्मो का फल ।।
बिन लफ्जो की कैसी जुबान है
शायद तु मेरे आसुँओ का हिसाब है
नहीं तो मेरे जख्मो का निशान है ।।
गुंजन द्विवेदी
Thursday, February 21, 2019
भाग्य (कविता)
ज्ञान की बोछार मे
भीगा आज विश्वास है।
कर्म की आड़ मे
पहचाना तु भाग्य है।।
किसी महान की रचना मे
तु देर लेकिन दुरूस्त है।
इस परिणाम के पीछे
तु राज बहुत जबरदस्त है।।
सफलता तक पहुँचने से पहले
करनी पडेगी तम्हारी उपासना
आज भी प्रभु तुम्हारी
हर प्राणी मे है वासना।।
जाने कब मेरे अक्षरो को
शब्द मिलेंगे ।।
जहाँ मेरे सपनों के
घर रहेंगे ।।
मेरे पन्नों पर भी
एक कहानी होगी
मेरी पहचान भी
अब न अनजनी होगी ।।
ज्ञान की बोछार मे
भीगा आज विश्वास है।
कर्म की आड़ मे
पहचाना तु भाग्य है।।
गुंजन द्विवेदी
Friday, November 23, 2018
मेरी किस्मत
जिंदगी का एक एक पल
सपनों मे संयोजा था ।
तुम्हारे मेरे साथ होते हुए भी
मैंने तुम्हें ढूँढा था ।
आसमान की उडान मे
उडने से भी सेहमता था ।
शिखर पर पहुँचने से पहले
फडफडाने से भी डरता था ।
आज के इस विश्वास पर
कल की कोई आस न थी ।
बरसात के इन बूँदो की
संसार को कोई प्यास न थी ।
उन आँखों की चमक चाहिए
जो बेतहाशा उम्मीद रखते है ।
मुझे दिलासा देकर
खुद सारे सितम सहते है ।
मुझे रोज़ समझाने वाले
आज कुछ न कहते है ।
फिर भी उनकी आँखों की झलक
मुझे वो सबकुछ कहते है ।
जल्दी , मैं उनके ख्वाब पुरे करता
खाश उनकी झोली खुशीयाँ से भरता ।
मैं भी कल आम नहीं
कुछ खास रहता ।।
जिंदगी का एक एक पल
सपनों मे संयोजा था ।
तुम्हारे मेरे साथ होते हुए भी
मैंने तुम्हें ढूँढा था ।
आसमान की उडान मे
उडने से भी सेहमता था ।
शिखर पर पहुँचने से पहले
फडफडाने से भी डरता था ।
गुंजन द्विवेदी
Sunday, October 14, 2018
एक फूल (कविता)
इस दुनिया की रीत यही ।
नन्हे फूलो की बगीया से प्रीत यही ।।
जब तक खिलकर तु रहता है ।
कीटो के डंग तु सहता है ।।
चार पहर के इस जीवन में ।
कितनी बार सहमते हो ।।
माली के इस मुख से ।
तुम क्यों नहीं कुछ कहते हो ।।
इसी कारण तुम वन नहीं ।
उपवन कहलाते हो ।।
इतना कष्ट सच मे कम नहीं ।
जो तुम सह जाते हो ।।
इस कलयुग के कल की ।
तुम आस मत करना ।।
अपने काँटो के अलावा ।
किसी पर विश्वास मत करना ।।
नहीं तो तुम भी मुझ जैसे ।
देखते रह जाओगे ।।
सूर्य ढलने से पहले ही ।
तुम तोड़ लिए जाओगे ।।
इस दुनिया की रीत यही ।
नन्हे फूलो की बगीया से प्रीत यही ।।
जब तक खिलकर तु रहता है ।
कीटो के डंग तु सहता है ।।
गुंजन द्विवेदी
हमारा भारत (कविता)
भारत के रसना मे अनोखी रास है।
तुम मे भी कुछ खास है।।
ममतामयी माँ से रीझे हो तुम ।
गर्वमान पिता के द्वारा सिंचे हो तुम।।
पहली लाली संग चरणों का आशीर्वाद मिलता।
हर सुपूत मे भारत का नाम मिलता ।।
सूर्य पर जितना विश्वास आज है।
दादा को अपने पोते पर उतना नाज है।।
यहाँ की मिट्टी मे कोई राज है।
यहाँ का बच्चा बच्चा विश्व का सरताज है।।
बिरजु हो या अब्दुल , कमाया इतना नाम है।
स्वयं उतर आए यहाँ भगवान राम है।।
यहाँ हर दिन , हर पल एक त्योहार है।
धर्मों की तो गाथा , गाता संसार हैं ।।
एकता , सद्भावना से अमूल्य यहाँ की रीति हैं ।
बेटी कल्पना तो हार कर भी जीती है ।।
हमारी सेना से विपक्षी भी भयभीत है ।
किसी ने सुनी न देखी , ऐसी रणनीत हैं ।।
गुंजन द्विवेदी ।
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तुमको देख रोम भी हर्ष मनाता इस भाव को ओठ भी रोक न पाता जाने तुम कैसी बला हो ईश्वर की अनोखी कला हो तुम्हारे नज़दीक आकर अज़ीब खुशी का आलम र...
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मै आने वाले कल का सार्थी हूँ। मैं एक विद्यार्थी हूँ। मुझ मे कोई अंश नहीं है भय का। लेकिन मैं लालिमा जरूर हूँ सूर्योदय का।। इस जग को पार ...